पुष्करणा संदेश की गौरवमई यात्रा
इस आलेख में हम पुष्करणा संदेश के स्वर्णमयी इतिहास पर संक्षिप्त चर्चा करेंगे| इतिहास अर्थात जो घटनाएं बीत
चुकी हैं| दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि मानव जीवन की विगत घटनाओं को इतिहास के नाम से जाना जाता है| आज की प्रत्येक घटना
कल इतिहास कहलाएगी| इसी प्रकार की अतीत के सभी आर्थिक, सामाजिक व राजनीतिक उत्थान तथा पतन के साथ हमारे पूर्वजों की
जीवनशैली व उनके कृत्यों को फिर से हमें स्मरण कराने में इतिहास सहायक सिद्ध होता है| किंतु अतीत और वर्तमान को एक सूत्र में
पिरोकर उन्हें श्रंखलाबद्ध करने के लिए कोई माध्यम चाहिए जो प्राचीन प्राचीन व अर्वाचीन के मध्य की दूरी को कम कर सके| इतना कम
कर दें कि पुरातन नूतन रूप धारण करके हमारे सम्मुख उपस्थित हो सके| तत्कालीन साहित्य व विभिन्न कलाकारों की कृतियों के माध्यम
से हम अतीत की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं|
साहित्य समाज का दर्पण होता है, जिसमें उसके गुण दोष प्रतिबिंबित होते हैं| दूसरे शब्दों में,
साहित्य किसी देश की राष्ट्रीय, सांस्कृतिक व जातीय भावना का प्रतीक होता है| इस दृष्टिकोण से 'पुष्करणा संदेश' की उपयोगिता व उपादेयता
निर्विवाद है जिसके कारण हम हमारे अतीत की आर्थिक, राजनीतिक तथा आध्यात्मिक जीवन की जानकारी प्राप्त करने में सफल हो सके हैं|
यही नहीं, यह पत्रिका हमारे पुष्करणा समाज के याथातथ्य सांस्कृतिक व सामाजिक जीवन की झलक को प्रस्तुत करने में सक्षम है| प्रत्येक
समाज का जीवन उत्थान पतन की करवट लेता हुआ भूत से भविष्य की ओर अग्रसर होता है| पुष्करणा समाज के इतिहास पर दृष्टिपात करें तो
एक ओर स्वतंत्रता का विजयनाद एवं ज्ञान में समृद्धि का उद्घोष है तो दूसरी और पराधीनता, कायरपन तथा कोरी विलासिता की कालीमा भी
विद्यमान है|
इसी प्रकार यदि भूतकालीन 'पुष्करणा संदेश' को पढें तो पाएंगे कि इस पत्रिका के अंतर्गत आलेखो में समाज के स्वर्णिम व मलिन
दोनों प्रकार के चित्रों को प्रत्यक्ष परोक्ष रूप से देख व अनुभव किया जा सकता है| हमें हमारे समाज के अंतर्गत व्याप्त अशोभनीय बिंदुओं को
देखने से इसलिए नहीं आंख मूंद लेनी चाहिए कि वह हमारे ह्वासोन्मुख काल की जानकारी देते हैं| बल्कि सच तो यह है कि इस प्रकार से हमें
यह चेतावनी दी जाती है कि हमारे समाज को उन्नति के पथ पर ले जाने के लिए हमारी कमियों को उजागर किया जाए ताकि समय रहते
उन्हें दूर किया जा सके| वस्तुतः पिछले अनेक वर्षों से 'पुष्करणा संदेश' की साहित्यधारा निरंतर प्रवाहित होती आ रही है| कुछ परिस्थितियां
वश कभी वह मंद गति से तो कभी तीव्रता लिए हुए रही है| अनेक बाधाओं के बाद भी हमारे समाज के प्रबुद्ध लेखक कविगण अपनी लेखनी
के बल पर 'पुष्करणा संदेश' को स्थायित्व व समृद्धि प्रदान करते रहे हैं| यही नहीं 'संदेश' के संरक्षण तथा उत्थान की पताका भी विभिन्न समय
में समाज के विशिष्ट व्यक्तियों के प्रयास से फ़हराती जा रही है| 56 वर्षों के अंतराल में कुछ 'पुष्करणा संदेश' की प्रकाशन संबंधी संक्षिप्त जानकारी
कराना प्रासंगिक होगा, जो निम्नलिखित है-
विक्रम संवत 2018 तदनुसार मई 1961 में दिल्ली से सर्वप्रथम प्रकाशित
- सितंबर 1962 तक पुष्करणा ब्राह्मण सभा का मुखपत्र
- अक्टूबर 1962 से अखिल भारतीय पुस्तिका ब्राह्मण सम्मेलन का मुखपत्र
-
- जनवरी 1965 से अक्टूबर 1973 तक जोधपुर से प्रकाशित
- जनवरी 1970 से अखिल भारतीय पुष्टिकर सेवा परिषद का मुखपत्र
नवंबर 1973 से दिसंबर 1992 तक इंदौर से प्रकाशित
जनवरी 1993 से अक्टूबर 2000 तक जोधपुर से प्रकाशित
नवंबर 2000 से अब तक बीकानेर से प्रकाशित
|
| विशेषांक प्रकाशन: |
| दिसंबर |
1967 |
फलोदी सम्मेलन विशेषांक |
| अप्रैल |
1982 |
बीकानेर विशेषांक |
| दिसंबर |
1986 |
जैसलमेर विशेषांक |
| प्रधान संपादक: |
| मई |
1961 |
श्री बांके बिहारी शास्त्री |
| जनवरी |
1965 |
श्री सरदारमल थानवी |
| दिसंबर |
1992 |
श्रीवल्लभ पनिया |
| जनवरी |
1993 |
श्री राम दत्त थानवी |
| नवंबर |
2000 |
श्री मोहनलाल किराडू |
| मई |
2001 |
श्री लक्ष्मीनारायण रंगा |
| मुख्य संपादक: |
| मार्च |
2007 |
से अब तक डॉ. (श्रीमती) बसंती हर्ष |
पुनश्च - इस पत्रिका की गौरवमयी यात्रा के अंतर्गत हम यह पाएंगे कि इसमें कहीं साहित्य परिचर्चा है तो कहीं कवियों की कविता कामिनी का सुंदर
विन्यास है| दूसरी और ज्योतिषियों के ज्योतिष ज्ञान से भी हम लाभान्वित होते रहे हैं| यही यही नहीं हमारे समाज के अनेक महापुरुषों के कृतित्व व
व्यक्तित्व से भी हमें प्रेरणा प्राप्त होती रहती है| इतिहास परक शोधार्थी के लिए भी पुष्करणा संदेश उपयोगी सिद्ध हो सकती है| पत्रिका के अंतर्गत
प्रकाशित होने वाले विभिन्न स्तंभ तथा देश प्रदेश की गतिविधियां, महिला जगत (खान-पान आदि), समाज गौरव, विदुर नीति, बोधकथा, कहावतें
तथा सामाजिक परिपेक्ष में रचित आलेखों से पत्रिका की पठनीयता व रोचकता में वृद्धि हुई है| क्योंकि पुष्करणा समाज का क्षेत्र भारतवर्ष में
सुदूर क्षेत्रों में जम्मू कश्मीर से कन्याकुमारी तक तथा विदेशों में भी फैला हुआ है|अतः 'पुष्करणा संदेश' ने भी अपनी पहुंच देश के अधिकतम कस्बों
व शहरों के साथ-साथ सुदूर देशों में भी बनाई है| कहना न होगा कि पुष्करणा समाज के हर वर्ग के लोगों के बीच में यह पत्रिका संपर्क का सशक्त
माध्यम थी और अब भी है| प्रारंभ से लेकर अब तक इसके कलेवर के विकास में भी उत्तरोत्तर वृद्धि हुई है| यही नहीं, पूर्व काल में भी इसकी
छपाई मशीन से होती थी लेकिन अब कंप्यूटर युग में 'पुष्करणा संदेश' इंटरनेट पर भारत ही नहीं विदेशों में बसे हुए हमारे भाई बंधुओं के लिए
भी सहजतापूर्वक पठनीय हो गई है|
हालांकि इस बात से हम नहीं नकार सकते कि कुछ आलेखों में प्रक्षिप्त व अतयुक्तियां है तो अनेक रचनाएं भी साधारण स्तर की है| 'पुष्करणा संदेश'
को अभी अपने स्तर को सुदृढ़ व विकसित करने के लिए लंबी यात्रा तय करनी होगी| इसमें सभी सुधि लेखकों व कवियों तथा साहित्यकारों का सहयोग
अपेक्षित रहेगा| फिर भी हमारी सभ्यता व संस्कृति के दिग्दर्शन हेतु यह पत्रिका एक सशक्त माध्यम बन सकती है| दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है
कि 'पुष्करणा संदेश' हमारे समाज की संस्कृति की संरक्षक भी है और पोषक है, हां कुछ उपवादो को उपेक्षित करना होगा| जैसा कि पूर्व में उल्लेख
किया जा चुका है कि इस सामाजिक पत्रिका की अनेक विशिष्टताओं का ही सुपरिणाम है कि आज यह 'संदेश' देशभर में ही नहीं अपितु विदेशों में
बसे हमारे पुष्करणा बंधुओं तक पहुंच कर उन्हें प्रमुख सामाजिक गतिविधियों से अवगत कराने का कार्य सुचारू रूप से कर रही है|
56 में बसंत में प्रवेश कर चुकी 'पुष्करणा संदेश' को कई बार पतझड़ व उनके आंधी तूफानों का सामना भी करना पड़ा| लेकिन सौभाग्यवश इसने
उन सभी गतिरोधो का सामना करते हुए भी अपनी यात्रा निरंतर बनाए रखी|
इसकी सबसे बड़ी विशेषता इसके अंतर्गत प्रकाशित गद्य पद्य आलेखों की उपलब्धियां हैं| यद्यपि कविता व कथाओं का प्रस्फुटन इस पत्रिका के
लिए सर्वथा नवीन वस्तु नहीं कहा जा सकता है लेकिन गद्य और पद्यमय कृतियां वर्तमान काल में लेखकों व साहित्य प्रेमी विद्यार्थियों के लिए
पथ प्रदर्शन की क्षमता रखती हैं|सच पुछा जाए तो आजकल दिन-ब-दिन नूतन कवियों और लेखकों में पत्रिका के अंतर्गत प्रकाशन हेतु नवीन रचनाएं
भेजने की होड सी मचने लगी है| यह हमारे समाज में शिक्षा व संस्कारों के प्रति पुनः नवीन जागरण का संकेत देती है| साथ ही समाज के पुनरुत्थान,
विकास व एकजुट होने के शुभ लक्षण दिखाई पड़ने लगे हैं| इसके साथ स्नेह और सदभावना पूर्वक रहने तथा उसके परिणाम स्वरूप निरंतर प्रगति करने
की हमारी समृद्ध परंपरा की वेदों में सुंदर शब्दों में अभिव्यक्ति हुई है| आइए, हम सभी पत्रिका की अनवरत यात्रा में 'पुष्करणा संदेश' को सहर्ष सहयोग
व संबल देते हुए निम्नलिखित वैदिक वाक्य का अनुसरण व अनुकरण करें|
वर्तमान में पुष्करणा संदेश के व्यवस्थापक संपादक का दायित्व श्री प्रकाशमल छंगाणी संभाल रहे हैं|
संगच्छध्वं, संवदध्वं, सं वो मनांसि जानताम
अर्थात हम सब साथ साथ चलें, साथ साथ बातचीत व विचार विमर्श करें और सदैव एक से मनोभावों से युक्त रहे|
इति शुभम्